Paag- पाग मर्यादा का प्रतीक

Paag- पाग मर्यादा का प्रतीक

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मिथिला की अनुपम एवं अनूठी सांस्कृतिक विरासत मे "पाग" एक मर्यादा तथा सम्मान का प्रतीक माना गया है जिसे सिर पर बड़े ही गर्व से धारण किया जाता है। वस्तुतः आदि काल मे मिथिला के लोग खासकर ब्राह्मण सिलाई किया हुआ परिधान नही पहनते थे। इसलिए उस समय मे "साठा" यानी साठ हाथ लंबा सूती कपड़े जो कि आठ इंच चौड़ा तथा लगभग नब्बे फुट लम्बा होता था उसको पागनुमा बनाकर सम्मानित किया जाता था। उस समय में साठा पगड़ीनुमा पाग शास्त्रार्थ एवं धौत परीक्षा के पश्चात् विद्वानों को ससम्मान माथे पर सुशोभित किया जाता था। साठा पाग की जटिलता को ध्यान में रखकर कालांतर में दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह के समय में इसके स्वरूप को बदला गया जो कि आज के समय मे अनुकरणीय है। 

मिथिला मे पाग का पारंपरिक प्रचलन ब्राह्मण एवं कायस्थ समाज मे मांगलिक अवसर पर होता रहा है। इस समाज के लोग पाग को अपने सांस्कृतिक संस्कार से जोड़कर देखते हैं। मिथिला में पाग के रंग का भी विशेष स्थान है जैसे : यज्ञोपवीत संस्कार यानि उपनयन में बरुआ के लिए लाल पाग एवं गुरुजन तथा श्रेष्ठ व्यक्तियों के लिए पीला पाग का प्रचलन है। ठीक उसी तरह विवाह मे वर के लिए लाल पाग तथा वर के पिता के लिए पीला या सफेद पाग तथा वारात एवं सगे संवंधीयों के लिए लाल, पीला, कोकटी, तथा सफेद रंग का पाग प्रचलित है। दुसरी ओर श्राद्ध कर्म तथा पितृ ॠण से निवृत्त होने के बाद कोकटी अथवा सफेद रंग का पाग मिथिला के समाज में प्रचलित है।

मिथिला समाज के लोगों का कहना है कि पाग का प्रयोग तांत्रिक लोग अनुष्ठान के समय में विशेष रूप से किया करते थे। पाग की विशिष्टता उसके बनाबट से भी है, इसके अग्रभाग जो ललाट पर रहता है वहाँ थारीदार तीन लाइन बना रहता है जो त्रिदेव ब्रह्मा-विष्णु-महेश का सूचक है। पाग के सबसे अग्रभाग जो भृकुटी और नेत्र के बीच करीब दो इंच लंबा गाँठ होता है वह आज्ञाचक्र को संयमित रखता है। इसके पृष्ठ भाग का कपड़ा सिर के उपर आगे की तरफ समेटकर एकत्र रूप से जुड़ा रहता है जिससे मस्तिष्क को केन्द्रीयकृत तथा उसके उपर कलगी का त्रीकोण स्वरूप पराक्रम का द्योतक है। इसके चारों तरफ घुमावदार पट्टी होता है जो कपाल के तरफ अधिक चौड़ा होता है जो अग्रभाग भाग को संयमित रखने तथा समूचे शरीर के संतुलित रखने के लिए होता है। आज भी मिथिला के समाज में मांगलिक अवसर जैसे गोसाओनि पूजा, देव पूजन, मुण्डन, उपनयन, विवाह, यज्ञ अनुष्ठान में धोती, कुर्ता, गंजी, दोपटा, पाग परिधान के रूप में प्रयोग किया जाता है। मिथिलामे अशौचावस्था एवं वैदिक श्राद्ध कर्म तथा पितृ ॠण से निवृत्त होने के पश्चात् धोती, कुर्ता, गंजी, दोपटा और पाग से सम्मानित किया जाता है । जिससे वहाँ के समाज में पितृ ॠण से उॠण होकर प्रतिष्ठित होने का सामाजिक मान्यता मिल जाता है।

विहार उरिसा रिसर्च सोसाइटी के जरनल मे मिथिला के सभी क्षेत्रों की प्राचीन परंपरा का उल्लेख मिलता है जिसमें मिथिला के पाग का भी उल्लेख किया गया है लेकिन इसके प्रादुर्भाव के बारे मे स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है। तेरहवीं शताब्दी के उदभट्ट गद्यकार ज्योतिरिश्वर ठाकुर के पुस्तक वर्णरत्नाकर में पाग की चर्चा की गयी है, इससे पता चलता है कि मिथिला में पाग की परंपरा काफी प्राचीन है और पाग एक मर्यादा का द्योतक परिधान है। चूँकि इसकी संरचना ऐसी है जिसे सिर पर धारण करने के बाद हिलने डुलने पर गिर जाता है इसलिए इसके स्वरूप में बदलाव की आवश्यकता है। एक बात निश्चित रूप से ध्यान देने योग्य है कि मिथिला का पाग वहाँ के संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है और यह वहाँ की परंपरा के अनुसार पवित्रता और सम्मान का सूचक भी है।

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